मैं मनुष्य हूँ..नहीं - नहीं .... मेरा नाम *आदमखोर*
मैं मनुष्य हूँ.. अरे नहीं - नहीं यह नाम तो मैंने बस संसार की आंखों में धूल झोंकने हेतु रखा हुआ है वास्तव में तो मेरा नाम *आदमखोर* है। मैं अपने इस नाम के अनुकूल ही व्यवहार करता हूँ। मैंने संसार में श्रेष्ठतम प्राणी व अमृत तुल्य दूध देने वाली *गाय* व सबका मल खाने वाले *सुअर* किसी को नहीं छोड़ा। कभी मैं बकरा खाता हूं, कभी भैंसा खाता हूं, कभी ऊंट खाता हूं, कभी मछली खाता हूं, यहां तक कि मैंने कुत्ते/गधे/घोड़े किसी को नहीं छोड़ा मैं सबको अपना आहार बना चुका हूँ। मैंने छिपकली को भून के खा लिया, सांप को कच्चा चबा लिया, चींटियों की चटनी बना के खायी तो 10-10 केकड़ों को उठाके मुंह में चबा लिया। मेढ़क को फ्राई करके खा लिया तो मछली को तड़पते हुए उसमें मसाला भर दिल धड़कते हुए काट - काट के खा लिया। पर मैं यहां भी नहीं रुक रहा, मेरी जीभ का स्वाद बढ़ता जा रहा है अब कुछ - कुछ देशों में मैंने *मानव भ्रूण* भी खाना आरम्भ कर दिया है आख़िरकार विकास भी तो होना चाहिए, विकास ही तो सफलता व सभ्य समाज का पैमाना है अतः मैं अपनी जीभ लपलपाते निरन्तर आगे बढ़ रहा हूँ और मुझे बस उस दिन की प्रतीक्षा है जब मैं पूर्ण सभ्य हो जाऊंगा और एक दूसरे को मारके पकाके खाने लगूंगा।
पर इतने सब अच्छे कर्म करने के उपरांत मुझे कभी - कभी किसी हाथी को मारे जाने का दुःख होने लगता है, किसी कुत्ते को छत से फेंकने पर मेरा ह्रदय फट जाता है, किसी घोड़े को अधिक पीटने पर मेरे अश्रु नहीं रुकते, कर भी क्या सकता हूँ आख़िरकार मैं एक मनुष्य जो हूँ।
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