एक निर्दोष जिसे फ़ांसी पर टांगा गया.....
धनजंय चटर्जी....
धनंजय चटर्जी मरते दम तक ,फ़ांसी के फंदे तक यही बोलता रहा कि "मैं निर्दोष हु""
जल्लाद ने इनसे कहा कि "मैं आपको फ़ांसी दे रहा हु इसके लिए मुझे माफ़ करे"
फ़ांसी देने के बाद जल्लाद बेहोश हो गया था...जल्लाद को तुरंत एम्बुलेंस से हॉस्पिटल ले जाया गया।।ये अब तक की पहली घटना थी जब जल्लाद बेहोश हुआ हो...क्योंकि धनंजय बेकसूर था।
धनजंय की मौत के बाद कई सामाजिक संगठनो ने फांसी और मीडिया ट्रायल पर सवाल उठाए....एक फ़िल्म बनाई जिसका नाम है "Right to live" इस फ़िल्म में दिखाया गया है कि किस तरह धनजंय को फंसाया गया। ये फ़िल्म बांग्ला भाषा मे यु ट्यूब में उपलब्ध है। धनंजय एक गरीब परिबार से ताल्लुक रखता था और एक स्कूल का चौकीदार था।। एक स्कूल में पढ़ने वाली बच्ची के रेप एवम मर्डर केस में इन्हें फ़ांसी हुई थी। बच्ची का मर्डर और रेप जरूर हुआ था मगर उसमे कही से भी धनंजय चटर्जी का हाथ नही था। उसे स्कूल मालिक और पुलिस ने मिलकर ऐसा बलि का बकरा बनाया जिसकी कल्पना नही कर सकते। मीडिया हाउस खरीद लिए गए...पुलिस और पब्लिक प्रासीक्यूटर खरीद लिए गए।। और एक बेकसूर को फांसी पर टांग दिया गया। भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 32 से पूरी दुनिया की अदालतें बहुत इत्तिफाक रखती है। क्योंकि ये नियम पूरी दुनिया की अदालतों में चलता है। जिसका नाम है "Dying Declaration" अर्थात मृत्यु कालिक कथन। न्यायविदों का यह मत है कि "मरते समय कोई व्यक्ति झूठ नही बोल सकता" तो फिर धनंजय ने आखिरी दम तक यही बात दोहराई की "मैं बेकसूर हु"" इसका क्या अर्थ निकाले?? भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ कलाम ने कहा था कि "भारत मे फ़ांसी की सजा बन्द होनी चाहिए क्योंकि यहां व्यापक पैमाने पर पुलिस और न्यायपालिका भ्रष्ट है"" एक तरफ गांधी की दुहाई दुसरी तरफ फ़ांसी की वकालत...ऐसा कैसे चलेगा मीलॉर्ड....ये गिरगिट चरित्र कब तक..?? धनंजय ने कहा था "मैं गरीब हु इसलिए मुझे फ़ांसी हो रही है"" नोएडा के रयान इंटरनेशनल स्कूल में भी हर सीबीआई जांच न होती तो हमारी मीडिया और पुलिस ने मिलकर एक निर्दोष बस ड्राइवर को आज फ़ांसी पर चढ़वा ही दिया था। जागिये...क्योंकि ये सब आपके साथ भी ,कभी भी हो सकता है। मीडिया नामक बीमारी जो कोरोना से भी घातक है,उसके खिलाफ भी लामबंद होइए...अगला नम्बर आपका भी हो सकता है। दंड के 5 सिद्धांत होते है जिनमे भारत दंड के सुधारवादी सिद्धान्त पर कार्य करने वाला देश है....तो प्रश्न ये है कि किसी को फांसी किस सिद्धान्त पर दी जा रही है...और फ़ांसी का फंदा गरीब पुरुषो के गले मे ही क्यों डाला जाता है??? अमीर या कोई औरत आजतक फ़ांसी पर क्यों नही लटके?? जबकि अब तक कई महिलाओ को फांसी की सजा सुनाई गई मगर लटकाया नही गया....क्यों????????
धनजंय की मौत के बाद कई सामाजिक संगठनो ने फांसी और मीडिया ट्रायल पर सवाल उठाए....एक फ़िल्म बनाई जिसका नाम है "Right to live" इस फ़िल्म में दिखाया गया है कि किस तरह धनजंय को फंसाया गया। ये फ़िल्म बांग्ला भाषा मे यु ट्यूब में उपलब्ध है। धनंजय एक गरीब परिबार से ताल्लुक रखता था और एक स्कूल का चौकीदार था।। एक स्कूल में पढ़ने वाली बच्ची के रेप एवम मर्डर केस में इन्हें फ़ांसी हुई थी। बच्ची का मर्डर और रेप जरूर हुआ था मगर उसमे कही से भी धनंजय चटर्जी का हाथ नही था। उसे स्कूल मालिक और पुलिस ने मिलकर ऐसा बलि का बकरा बनाया जिसकी कल्पना नही कर सकते। मीडिया हाउस खरीद लिए गए...पुलिस और पब्लिक प्रासीक्यूटर खरीद लिए गए।। और एक बेकसूर को फांसी पर टांग दिया गया। भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 32 से पूरी दुनिया की अदालतें बहुत इत्तिफाक रखती है। क्योंकि ये नियम पूरी दुनिया की अदालतों में चलता है। जिसका नाम है "Dying Declaration" अर्थात मृत्यु कालिक कथन। न्यायविदों का यह मत है कि "मरते समय कोई व्यक्ति झूठ नही बोल सकता" तो फिर धनंजय ने आखिरी दम तक यही बात दोहराई की "मैं बेकसूर हु"" इसका क्या अर्थ निकाले?? भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ कलाम ने कहा था कि "भारत मे फ़ांसी की सजा बन्द होनी चाहिए क्योंकि यहां व्यापक पैमाने पर पुलिस और न्यायपालिका भ्रष्ट है"" एक तरफ गांधी की दुहाई दुसरी तरफ फ़ांसी की वकालत...ऐसा कैसे चलेगा मीलॉर्ड....ये गिरगिट चरित्र कब तक..?? धनंजय ने कहा था "मैं गरीब हु इसलिए मुझे फ़ांसी हो रही है"" नोएडा के रयान इंटरनेशनल स्कूल में भी हर सीबीआई जांच न होती तो हमारी मीडिया और पुलिस ने मिलकर एक निर्दोष बस ड्राइवर को आज फ़ांसी पर चढ़वा ही दिया था। जागिये...क्योंकि ये सब आपके साथ भी ,कभी भी हो सकता है। मीडिया नामक बीमारी जो कोरोना से भी घातक है,उसके खिलाफ भी लामबंद होइए...अगला नम्बर आपका भी हो सकता है। दंड के 5 सिद्धांत होते है जिनमे भारत दंड के सुधारवादी सिद्धान्त पर कार्य करने वाला देश है....तो प्रश्न ये है कि किसी को फांसी किस सिद्धान्त पर दी जा रही है...और फ़ांसी का फंदा गरीब पुरुषो के गले मे ही क्यों डाला जाता है??? अमीर या कोई औरत आजतक फ़ांसी पर क्यों नही लटके?? जबकि अब तक कई महिलाओ को फांसी की सजा सुनाई गई मगर लटकाया नही गया....क्यों????????
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