21वी सदी में नारीवाद(feminism)
चार्ल्स फोरियर ने जब 1837 में फेमेनिस्म शब्द गढ़ा होगा तब उन्होंने सपने में भी नही सोचा होगा ये फेमेनिस्म समाज के लिए इतना घातक हो जायेगे यूँ तो बात समान अधिकारों की थी लेकिन २०वीं और २१वी शदी में ये समान अधिकारों से भटककर नगनता,समलैंगिकता, झूठे बलात्कार के आरोप, मी टू के झूठे आरोपों, नो ब्रा मूवमेंट आदि सामाजिक कुरीतियों में परिवर्तित हो गया इसी फेमेनिस्म के कारण न जाने कितने परिवार टूट गये झूठे रेप और दहेज़ उत्पीडन के आरोपों के कारण हर साल हज़ारों लोग सिर्फ भारत में आत्महत्या करते है लाखो निर्दोष लोग जेल जाते है
21वी सदी में नारीवाद(feminism) के मायने और उद्देश्य पूरी तरह से बदल चुके है छोटे कपडे पहनना या नंगा घूमना, समलैंगिक संबंध बनाना, झूठे रेप और दहेज़ के आरोप लगा के पुरुषो की जिन्दगी बर्बाद करना, शराब पीना, नशा करना, मोहल्ले भर से संबंध बनाना आदि ही नारीवाद(feminism) है नारीवादियो के हिसाब से मेहनत मजदूरी करके घर का चूल्हा जलाने वाली महिला कमजोर है और अंग प्रदर्शन करके रूपए कमाने वाली महिला सशक्त नारी है
नारीवादी महिलाओ ने समाज को जो दिया वो आज उनको वापस मिल रहा है जिस समाज में अधिकतर लड़किया अर्धनग्न होकर घूमना शुरू कर देंगी जिस समाज में मांस मदिरा और सेक्स का एक हद से ज्यादा प्रचार हो वहा रेप नही तो क्या भगवती जागरण होगा। आज तक मैंने किसी महिला को बढ़ती अश्लीलता के खिलाफ आवाज उठाते नही देखा है उल्टा उसे जस्टिफाई करते देखा है। जो मासूम बच्चे कच्ची उम्र से ही फिल्मो में रेप औऱ नग्नता /अश्लीलता फलाने वाली औरतो को देखते है वो बच्चे बड़े होकर राम या कृष्ण तो नही बनेगे।इतना दिमाग तो इस समाज और आधुनिक नारी को होना चाहिए।सोच बदलने की दुहाई देने वाली धूर्त स्त्रिया खुद कब चरित्र बदल रही है?
21वी सदी में नारीवाद(feminism) के मायने और उद्देश्य पूरी तरह से बदल चुके है छोटे कपडे पहनना या नंगा घूमना, समलैंगिक संबंध बनाना, झूठे रेप और दहेज़ के आरोप लगा के पुरुषो की जिन्दगी बर्बाद करना, शराब पीना, नशा करना, मोहल्ले भर से संबंध बनाना आदि ही नारीवाद(feminism) है नारीवादियो के हिसाब से मेहनत मजदूरी करके घर का चूल्हा जलाने वाली महिला कमजोर है और अंग प्रदर्शन करके रूपए कमाने वाली महिला सशक्त नारी है
नारीवादी महिलाओ ने समाज को जो दिया वो आज उनको वापस मिल रहा है जिस समाज में अधिकतर लड़किया अर्धनग्न होकर घूमना शुरू कर देंगी जिस समाज में मांस मदिरा और सेक्स का एक हद से ज्यादा प्रचार हो वहा रेप नही तो क्या भगवती जागरण होगा। आज तक मैंने किसी महिला को बढ़ती अश्लीलता के खिलाफ आवाज उठाते नही देखा है उल्टा उसे जस्टिफाई करते देखा है। जो मासूम बच्चे कच्ची उम्र से ही फिल्मो में रेप औऱ नग्नता /अश्लीलता फलाने वाली औरतो को देखते है वो बच्चे बड़े होकर राम या कृष्ण तो नही बनेगे।इतना दिमाग तो इस समाज और आधुनिक नारी को होना चाहिए।सोच बदलने की दुहाई देने वाली धूर्त स्त्रिया खुद कब चरित्र बदल रही है?
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